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       <title>Today Muslim Family Wait for Janmashtami News | Latest Muslim Family Wait for Janmashtami News | Breaking Muslim Family Wait for Janmashtami News in English | Latest Muslim Family Wait for Janmashtami News Headlines - Inkhabar</title>
        <description>आज का Muslim Family Wait for Janmashtami समाचार:Today Muslim Family Wait for Janmashtami News ,Latest Muslim Family Wait for Janmashtami News,Aaj Ka Samachar ,Muslim Family Wait for Janmashtami समाचार ,Breaking Muslim Family Wait for Janmashtami News in Hindi, Latest News Headlines - Inkhabar</description>
        <link>https://www.inkhabar.com/tag/muslim-family-wait-for-janmashtami</link>
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        </image><item><title>बिहार: एक ऐसा गांव जहां के मुसलमानोंं को रहता है जन्माष्टमी का इंतजार, बढ़ाते हैं त्योहार की शोभा</title><link>https://bihar.inkhabar.com/culture/bihar-a-village-where-muslims-wait-for-janmashtami-enhance-the-beauty-of-the-festival/</link><pubDate>September 6, 2023, 6:27 am</pubDate><image>wp-content/uploads/2023/09/download1.png</image><category>टॉप न्यूज़</category><excerpt>पटना। जन्माष्टमी हिंदुओं का त्योहार है और हर साल सभी को इसका बेसब्री से इंतजार रहता है। वहीं बिहार में एक ऐसा गांव है जहां के मुस्लिम परिवार को हर साल जन्माष्टमी का इंतजार रहता है। यहां सभी बांसुरीवाले के दीवाने हैं। जन्माष्टमी पर बढ़ जाती बांस...</excerpt><content>
&lt;p&gt;&lt;strong&gt;पटना।&lt;/strong&gt; जन्माष्टमी हिंदुओं का त्योहार है और हर साल सभी को इसका बेसब्री से इंतजार रहता है। वहीं बिहार में एक ऐसा गांव है जहां के मुस्लिम परिवार को हर साल जन्माष्टमी का इंतजार रहता है। यहां सभी बांसुरीवाले के दीवाने हैं।&lt;/p&gt;



&lt;h2 class=&quot;wp-block-heading&quot;&gt;&lt;strong&gt;जन्माष्टमी पर बढ़ जाती बांसुरी की बिक्री&lt;/strong&gt;&lt;/h2&gt;



&lt;p&gt;यह माना जाता है कि जन्माष्टमी या कृष्णाष्टमी हिंदुओं का त्योहार है। हर साल सभी लोग बेसब्री से अपने लड्डू गोपाल का जन्मोत्सव मनाने की तैयारी में लगे रहते हैं। वहीं मुजफ्फरपुर के कुढ़नी प्रखंड के बड़ा सुमेरा मुर्गिया चक गांव में लगभग 25 से 30 मुस्लिम परिवार ऐसे हैं, जो कई पीढीयों से बांसुरी बनाने का काम कर रहे हैं। इन परीवारों का कहना है कि जन्माष्टमी पर उनकी बांसुरी खरीदने वालों की संख्या बढ़ जाती है। इन परिवारों की जिविका चलाने का एकमात्र जरिया बांसुरी बनाना और बेचना है।&lt;/p&gt;



&lt;h2 class=&quot;wp-block-heading&quot;&gt;&lt;strong&gt;नरकट की लकड़ी से बनाते हैं बांसुरी&lt;/strong&gt;&lt;/h2&gt;



&lt;p&gt;मुस्लिम परिवारों के अनुसार जन्माष्टमी के समय और दशहरा के मेले में भगवान कृष्ण के इस वाद्ययंत्र बांसुरी की बिक्री बढ़ जाती है। इन बांसुरियों को नरकट की लकड़ी से बनाया जाता है। इस क्षेत्र में नरकट की खेती भी की जाती है। गांव के ही बांसुरी बनाने वाले नूर मोहम्मद बताते हैं कि वह 12- 15 साल की उम्र से बांसुरी बना रहे हैं। उन्होंने बताया कि भले ही अब नरकट के पौधों में कमी आ गई है लेकिन यहां के लोग आज भी नरकट से बांसुरी का पारंपरिक तरीके से निर्माण कर रहे हैं। कारीगर बांसुरी बनाने के लिए दूसरे जिले से भी नरकट खरीदकर ले आते हैं। नरकट को छील कर सुखाया जाता है और इसके बाद बांसुरी तैयार की जाती है। एक बांसुरी को बनाने में लगभग पांच से सात रुपये का खर्च आता है। एक परिवार, एक दिन में करीब 100 से अधिक बांसुरी बना लेता है। यहां बांसुरी की कीमत 10 रुपए से लेकर 250 से 300 रुपये तक है। गांव में ऐसे लोग भी हैं जो बांसुरी बनाते भी हैं और उसे घूम-घूमकर बेचते भी करते हैं।&lt;/p&gt;



&lt;h2 class=&quot;wp-block-heading&quot;&gt;&lt;strong&gt;देश-प्रदेश तक जाती है बांसुरी&lt;/strong&gt;&lt;/h2&gt;



&lt;p&gt;गांव के ही बांसुरी बनाने में निपुण मोहम्मद आलम बताते हैं कि उन्होंने अपने पिता से करीब 40 साल पहले बांसुरी बनाने की कला सीखी थी। तब से अब तक वह इस कार्य में लगे हुए हैं। उन्होंने कहा कि यहां की बनाई बांसुरी की कोई जोर नहीं है। यहां की बांसुरी की खनक भरी धुन अलग होती है। यहां से बांसुरी न सिर्फ बिहार के सभी जिलों में बल्कि झारखंड, यूपी और नेपाल, भूटान तक जाती है।&lt;/p&gt;



&lt;h2 class=&quot;wp-block-heading&quot;&gt;&lt;strong&gt;कला को बचाने के लिए चाहिए आर्थिक सहायता&lt;/strong&gt;&lt;/h2&gt;



&lt;p&gt;बांसुरी बनाने वाले कारीगरों ने अपनी पीड़ा बताई है कि उनकी कला को बचाए रखने के लिए कोई मदद नहीं मिल रहा। उनकी मांग है कि सरकार की ओर से उन्हें इसके लिए आर्थिक सहायता प्रदान की जाए जिससे यह कला विलुप्त होने से बच सके। उनका कहना है कि वर्षों तक अपने दम पर उन्होंने इस कला को बचा कर रखा है, लेकिन अब उन्हें इस व्यापार को बढ़ाने के लिए सरकार के मदद की दरकार है। इन्हें नरकट की लकड़ी की ही नहीं, बाजार की भी जरूरत है।&lt;/p&gt;
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